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You Are More...

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You are more than your failures, more than your lacking,  You are more than their expectations,  more than their backing. You are more than what they tell you,  more than what you think. You are more than what they let you, You are more than on the brink. You are more than what you have, More than what you've been. You are more than just mediocrity,  More than in between. You are more than your fears,  More than your doubts.  You are more than your dreads, More than anxious bouts. You are more than their perception, More than their judging.  You are more than their reaction, More than their nudging. You are more than you are valued, More worthy than said.  You are more than your impressions, More precious than acknowledged. You are more than you realise,  And much more than they do. You are what no one else is,  And nobody can be you!                             ~Neha ...

इसका अर्थ ये नहीं...

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छोटा है अगर सुनो,  तुम्हारी दृष्टि का प्रसार। इसका अर्थ ये नहीं,  कि छोटा हो गया संसार। छोटे हैं अगर सुनो, तुम्हारी सोच के कदम।  इसका अर्थ ये नहीं, कि छोटा हो गया गगन। छोटी हैं अगर सुनो, तुम्हारी अपनी ख्वाहिशें।  इसका अर्थ ये नहीं,  कि औरों पे हों बंदिशें। छोटा है अगर सुनो, तुम्हारे मन का दायरा।  इसका अर्थ ये नहीं,  कि सिकुड़ गई धरा। छोटे हैं अगर सुनो,  तुम्हारी हसरतों के पर। इसका अर्थ ये नहीं, सभी के पर दो कतर। छोटे हैं अगर सुनो,  तुम्हारे नयन के सपन। इसका अर्थ ये नहीं,  कि हर नयन हो विपन्न। छोटा है अगर सुनो,  तुम्हारी सोच का सफर। इसका अर्थ ये नहीं,  सभी की सोच बेकदर। क्षीण है अगर सुनो, तुम्हारे स्वेद की दमक। इसका अर्थ ये नहीं, सितारे छोड़ दें चमक। मंद हैं अगर सुनो,  तुम्हारे आस-पास स्वर। इसका अर्थ ये कहां, कि तुम न स्वर रखो प्रखर। छोटा है अगर तुम्हें,  जो मिला है आसमां।  तुम उसे विस्तार दो,  खोज कर नई विमा। ~नेहा दशोरा

सूर्योदय

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क्षितिज पर उजाला, हो जब फैलता, गगन को कभी,  उस समय देखना। सूर्यास्त निश्चित मनोहारी है, मगर तुम कभी  सूर्योदय देखना। शांत और स्थिर,  छटा प्रकृति की, भोर का एक  धुला सा  आभास है। ज्योति का स्त्रोत कोई प्रकट होता ज्यों, एक डिबिया सा  खुलता  आकाश है। वो सिंदूरी रंगत, चांद सूरज की संगत, अलसाये जग के, जगने की आहट। होती है जाग कहीं, चूल्हे में आग कहीं, वर्जिश करे कोई, छुंकता है साग कहीं। नज़र नज़ारे आते, पंछी चहकते गाते। जीवन का चक्का खुलता, धुलते चौक–अहाते। चाय की प्याली भी है, कुछ बे–ख़याली भी है। फुर्सत के पल भी हैं, कुछ बेहाली भी है। लाली से पीत आभा, पीत से धवल होता। कालिमा बुहार कर, निर्मल और उज्ज्वल होता। भोर का सुबह होना, जादुई एहसास है। कितने रंग नभ में बिखरे, जैसे कैनवास है।                            ~नेहा दशोरा 

बेटियाँ

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हम बेटियाँ ईश्वर का वरदान होती हैं,  हम बेटियाँ तो नूर ए-जहाँ होती हैं।  दुनिया की सबसे बड़ी खुशी हम ही तो हैं,  इसलिए तो हम खुशी की खान होती हैं। हम बेटियाँ कभी तो शुभ समाचार होती हैं, और कभी आँसू वाली कटार होती हैं।  वक्त कभी आए तो हम से भी कहना,  हम ही तो लक्ष्मीबाई का प्रहार होती हैं हम बेटियाँ सिर्फ आँखों का पानी नही हैं,  हमारा होना यूँ ही बेमानी नहीं है।  एक बार हमको आज़मा के देखिए,  इस जहाँ में हमारा कोई सानी नहीं है। हम बेटियाँ तो हर घर की जान हैं, आपकी आरजू, तमन्ना और शान हैं, घर की जीवंतता हैं हम, घर का प्राण हैं, हमारे बिना घर बस एक मकान है। आगे बढ़ते रहने की हम में एक ललक है,  पैरों में है, जमीं आँखों में फलक है।  बढ़ रहे हैं आगे अब तलक तो हम,  और अब भी ऊँचाई पर हमारी पलक है। इस इच्छा इस ललक को आकार देना है,  एक ठोस धरातल एक आधार देना है।  आप सबका स्नेह और दुलार चाहिए, एक मूर्ति को रक्त का संचार देना है।                               ...

छोटे या बड़े?

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तुम्हारे गर्व छोटे हैं, छोटे हैं तुम्हारे सुख।  तुम्हारे दर्प छोटे हैं,  छोटे हैं तुम्हारे दुख। हैं सोचें भी बहुत छोटी, मन भी है तेरा छोटा।  तेरी धरती भी छोटी है,  गगन भी है तेरा छोटा। है छोटापन भी बातों में,  हंसी में और ठहाकों में। तुम्हारी गूंज है छोटी, है छोटापन धमाकों में। तुम्हारे रंग छोटे हैं, तुम्हारे ढंग छोटे हैं। तुम्हारे साथ छोटे हैं,  तुम्हारे संग छोटे हैं। तुम्हारी दृष्टि है छोटी,  तुम्हारी सृष्टि है छोटी।  तुम्हारे परदे छोटे हैं,  तुम्हारी पुष्टि है छोटी। बड़े होने का मतलब है,  नहीं पदवी बड़ी पाना। बड़े होने का मतलब है, नहीं पैसा कमा पाना। बड़ा होता है  इंसां  जब कि, वो रखता बड़ा दिल है।  बड़ा होना नहीं आसां,  बड़ा होना ही मुश्किल है। बड़ा होता नहीं इंसां,  फ़क़त  उम्रें बड़ी करके।  बड़ा होना नहीं होता,  इमारत ही खड़ी करके। बड़ी सोचें ज़रा रखना, बड़े अभ्यास भी करना। बड़ा रखना इस ज़ेहन को, बड़े आभास भी करना। सुनो ऊंचे ज़रा उठना,  औ खुद से रू-ब-रू होना। बनाना खुद को यों बेहतर, कि एक दिन सुर्ख़रू होन...

वे लोग...

वे लोग थे,  हीरे से। सशक्त और दीप्त,  उत्कृष्ट और उद्दीप्त।  वे लोग थे,  सागर से।  अथाह और गंभीर,  और न खोते धीर।  वे लोग थे,  वृक्षों से।  करुण और उदार,  मन में परोपकार।  वे लोग थे,  संगीत से।  मधुर और सुखद,  भुला देते थे विपद।   वे लोग थे,  कथाओं से। रोचक और अमूल्य,  इसलिये थे अतुल्य। वे लोग थे,  गगन से। अनंत और उदात्त, विचारों से विराट। वे लोग थे,  पर्वत से। अडिग और विशाल,  सदा ही ऊंचा भाल। वे लोग थे,  पवन से। पछुवा या पुरवाई,  सदैव शांतिदायी। वे लोग थे, विश्वास से। गहन और घनीभूत,  भरोसा ज्यों अटूट। वे लोग थे, रंगों से। चटक और चंचल,  हर एक का संबल। वे लोग थे, उड़ान से। ऊंचे और उन्मुक्त, चेतना से युक्त।               ~नेहा दशोरा

ये क्यों है?

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खुद ही से खुद को झुठलाना, ये कैसी लाचारी है?  कथनी करनी भेद दिखाना,  ये कैसी होशियारी है? निर्बल ऊपर रौब जमाना, ये कैसी दमदारी है?  औरों की गठरी हथियाना,  ये कैसी ऐयारी है? अपनी ढपली राग भी अपना, ये तो एक फनकारी है।  लेकिन औरों को धकियाना,  ये तो बड़ी मक्कारी है। सोचो तो कितना ही सोचो,  दुनिया में गम भारी है। हर एक को ये लगता है कि, दर्द से उसकी यारी है। हम इस दुनिया के बंदे हैं,  और ये दुनिया प्यारी है।  उसने हमको जो बख्शा है,  हम उसके आभारी हैं। लालच के आगे ढह जाए, ये कैसी खुद्दारी है?  अपना कहकर पीठ दिखाए,  ये तो बड़ी गद्दारी है। चकाचौंध के पीछे भागे,  दुनिया को बीमारी है।  अपने हित को हामी भरते,  दूजे को इंकारी है। यों ही धरा ये रह जाना है,  जो कुछ भी संसारी है।  एक दिन सहसा कूच करेंगे,  फिर कैसी तैयारी है?                        ~नेहा दशोरा