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ये लड़कियां

ये खीज क्यों, गुस्सा है क्यों,  क्यों ये अजब खामोशी? ये लड़कियाँ, थी तितलियाँ,  क्यों हैं ये चुप शामों सी हैं? बेवजह ये रूठ जाती, लब क्यों सी लेती हैं? क्यों ये पल में मुस्कुरा कर, दर्द पी लेती हैं? हर कोई हैरान है पेचीदा पहेली सी है वो। गौर से जो हल करोगे, सचमुच अकेली सी है वो। घर है पहले, पहले कुनबा,  उसने ये सीखा सदा,  खुद से पहले और सभी का, दर्द है दीखा सदा।                    ये तुनक, ये गुस्सा जो है,  असल मे ये पर्त है। इन सभी से वाबस्ता प्यार है, बेशर्त है। अब तो गुस्ताख़ी भी करती बढ़ रही है देख लो। अपनी आँखों मे ये सपने गढ़ रही है देख लो। क्या ज़रूरत है उसे जब सब किया उसके लिये, क्यों जलाने चल पड़ी है, हसरतों वाले दिये? क्यों भला जाएगी बाहर, क्यों मशक्कत करेगी? उसे तो घर ही मुबारक क्यों ये जुर्रत करेगी? ये ज़माना और है कुछ,  यहाँ तो पर खोलेगी, अपने सपने, अपने अरमां,  हौंसले वो तौलेगी।                     हाँ मगर, ये ध्यान रखे चाहे उड़ ले जितना ही...

एक प्रार्थना

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वर देना, पर देना  शब्दों को स्वर देना। कर्म और मन, बुद्धि को दृढ़ता से भर देना। विद्या और मेधा पाएं लक्ष्यों को भेदा जाए। स्थिर हों चित्त और चिंतन ऐसा कुछ कर देना। कला का आगाज़ हो,  गुणों को परवाज़ हो। सुलझे और सुथरे हो मन भटकों को घर देना। शांति संदेश देना, क्रांति आदेश देना। जब जो ज़रूरी है वैसी गुज़र देना । ज्ञान और विज्ञान देना,  सच का संज्ञान देना।  पढ़-लिख पाएं सभी,  सबको आखर देना। दे देना सद्बुद्धि , हर लेना दुरबुद्धि।  ना खोदे कोई खाई, संकट सब हर लेना। संगीत लहरी देना,  समझ भी गहरी देना। नवरस का स्वाद देना आनंद अमर देना । सब ओर उजास होवे, मन ना उदास होवे। सबके दिलों में वो,  सुख का निर्झर देना। कलम को धार देना, शब्दों को भार देना। शुचिता का वर देना बुद्धि प्रखर देना। सबको हुनर देना हुनर को पर देना। जो बीज बोता है,  उसको समर देना। –नेहा दशोरा

जीवन का सार

उपमाऐं कुछ नहीं शेष,  क्या लिखूं कहूं अब क्या विशेष?  संघर्ष लिखूं इस जीवन को,  या कहूँ प्रगति का श्रीगणेश? धरती की पहचान लिखूं विधाता का अनुसंधान लिखूं? मानव के बढ़ते कदम गिनूं,  कि संस्कृति का अवसान लिखूं? कातरता अवसाद कहीं,  कष्टों की करुण कहानी। हर्ष और उल्लास कहीं, आल्हाद है ये ज़िंदगानी। जीवन अनंत का सार लिखूं,  या लघु जीवन का प्रसार लिखूं? निराकार की रचना है, या स्वयं प्रभु साकार लिखूँ? लिख दूं जीवन छोटा सा है, या इसके वैराट्य को दूं बखान?  जीवन के माने लिखने हों तो, छोटा पड़ता जग का ज्ञान। हर इक जीवन अपने में, एक अमिट कहानी कहता है। ठोकर खाकर गिरता तो है,  पर आगे बढ़ता रहता है। तो जीवन की हर परिभाषा हम ही लिखते, गढ़ते हैं। सच है जीवन जीते हैं तब जब कि खुद को पढ़ते हैं। –नेहा दशोरा

खो देना...

जो खोते हैं, क्यों खोते हैं?  खो देकर फिर, क्यों रोते हैं ?  जो खोया है साथ नहीं है,  जो पाया, वो बात नहीं है।  मोल-तोल के इन झगड़ों में, इसके ना उसके होते हैं। ये मानुष का मन है ऐसा,  जिससे मिलता ढलता वैसा, रंग चढ़े ही है संगत का,  खोकर भी वो ना खोते हैं। माना वो अब साथ नहीं है, खोना–पाना हाथ नहीं है। फिर भी खोने या पाने पर,  फूट पड़े मन के सोते हैं। खो देना क्या खो देना है ? पा लेना क्या पा लेना है ?  जो ना है वो ना होना था,  होने थे जो वो होते हैं। वो खोया है, ये है पाया,  कहते इसको दुनिया-माया । होगा अदा जो बदा हुआ है,  जीवन के से सब गोते हैं।   वो मिट्टी था या सोना था, जो खो बैठे वो खोना था। जो खोया है, ना खोया है, जीवन में वो भी बोते हैं। कुछ पा करके कुछ खोते हैं, पर खोने को ही रोते हैं। मानव मन यों भी होते हैं, मानव मन यों ही होते हैं। –नेहा दशोरा

सहज होना

सहज होना, सहल होना, न आसां है सरल होना । ना अमृत हाथ आ पाए, है दुनिया का गरल होना। सदा ही धार पर रहना, सदा मझधार में बहना। घिरे रहना है कीचड़ से, यूं जैसे कि कमल होना । बड़ी होशियार ये दुनिया तेज़-तर्रार ये दुनिया। है जीना ही बड़ा मुश्किल, तुम्हें होगा चपल होना । हैं पत्थर के दिलों वाले, बड़े ही हौसलों वाले।  तुम्हें दुख-दर्द ही देगा, हृदय का यों तरल होना । ये झूठा वायदा देंगे,  तुम्हारा फायदा लेंगे।  गढ़ेंगे सैकड़ों किस्से, मगर मुश्किल अमल होना। तुम्हें ना ज्ञान है छल का,  न ही संज्ञान कपट–बल का।  कोई धोखा न दे जाए, जरूरी है संभल होना। मगर फिर भी सरल होना,  सहज होना, सहल होना। नहीं देना कभी धोखा, नहीं कोई नहीं ज़हर बोना। –नेहा दशोरा

जल्दी क्या है?

जल्दी क्या है, कहां है जाना? कैसी नगरी कौन ठिकाना? भागे जाना, भागे जाना  रुकने का ना कोई बहाना। इतनी जल्दी फिर भी ठहरे,  रोज़ाना की वर्दी पहरे। दिन उगता, दिन ढल भी जाता ना मिलता बस कोई मुहाना। मैं भी दौडूं, तुम भी दौड़ो, मुट्ठी से रेती को छोड़ो। सबकी उम्रें फिसली जाती, गुज़रा जाता यूं भी ज़माना। उलझन में हैं हम, और तुम भी, खोया है मन, और है गुम भी। इसके–उसके राग हो गाते, भूल गए हो अपना तराना। फिर मंज़िल को पूगे हो जब, रीत चुके हो, सूखे हो तब। वो रस्ते क्या तुमने चुने थे? या तुमको था रीत निभाना? क्या है जीवन? क्या सार है इसका? पलड़ा भारी, या इसका, उसका। है रस्साकशी, है खींचातानी, बस खुद को है श्रेष्ठ बताना। लेकिन क्या बस सार यही है? ना–ना मेरे यार, नहीं है। तुमको, हां तुमको ही तो, लिखना होगा अपना गाना। जल्दी क्या है? क्यों भागे हो? सोते में भी क्यों जागे हो? जीवन को जीना होता है, ना कि इसको है निपटाना। जब हो जहां, वहीं रह लो ना, जो कहना है, वो कह लो ना। ऊब गए हो इन पचड़ों से, बंद करो अब खुद को छिपाना। जल्दी में भी हो, ऊबे भी, हरदम चिंता में डूबे भी। तुमसे है ये दुनिया, दुनिया, ...

मन में दर्द, हंसी चेहरे पर...

  मन में दर्द, हंसी चेहरे पर ये कैसा संवेदन है? जीवन की सारी सुविधाओं से, क्या ये ही परिमार्जन है ? आंसू से भीगी पलकें और , उन्हें छुपाती एक मुस्कान जीवन के कैसे पहलू का, जाने ये उदाहरण है। जीवन यांत्रिक बना इस तरह, संवाद नहीं, संकेतन है। खोई सारी मानवता, बढ़े भले संसाधन हैं । जीवन जीने की खातिर, सिद्धांत ज़रूरी नहीं रहे। सभ्यता के स्वर्णिम पृष्ठों का हुआ यहाँ संपादन है। सरल हृदय न मिले कहीं पर, छल से भरे यहां मन हैं। कपट की क्षमता से होता, बुद्धिचातुर्य का मापन है। जीवन की परिभाषा बदली, बदली गये हैं सोच विचार। आने वाली किसी लहर से, पहले का उद्घोषण है।                  ~नेहा दशोरा